Life Is Not Fair – But It Is Teachable
Page 6: तुलना विकास को नष्ट करती है
तुलना स्वाभाविक लगती है।
हम देखते हैं कि दूसरे कहाँ पहुँचे,
और खुद को वहीं मापने लगते हैं।
यहीं से विकास रुकने लगता है।
तुलना क्यों नुकसानदेह है?
तुलना आपको यह भूलने पर मजबूर करती है कि:
- हर किसी की शुरुआत अलग होती है
- हर किसी का समय अलग होता है
- हर किसी की यात्रा अलग होती है
एक ही पैमाना सब पर लागू नहीं होता।
तुलना के दुष्परिणाम
- ईर्ष्या बढ़ती है
- आत्मविश्वास घटता है
- ध्यान भटकता है
आप अपनी राह छोड़ देते हैं।
छठा सबक
तुलना प्रेरणा नहीं,
ध्यान की चोरी है।
बेहतर विकल्प
दूसरों से नहीं,
खुद से तुलना करें।
आज का आप, कल के आप से बेहतर है या नहीं —
यही असली माप है।
आज का आत्म-चिंतन
खुद से पूछिए:
“मैं किससे तुलना कर रहा हूँ और इसका मुझे क्या मूल्य चुकाना पड़ रहा है?”
ध्यान वापस लाने से विकास तेज होता है।
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असफलता आपकी पहचान नहीं है
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